Thursday, 19 August 2021

काल सर्प दोष निवारण पूजा, मुहूर्त, सामग्री, प्रकार और फायदे

 

कालसर्प दोष पूजा त्र्यंबकेश्वर में होने वाली अति महत्वपूर्ण पूजा में से एक पूजा है। त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र नासिक (महाराष्ट्र) से २८ किमी अंतर पर स्थित है। १२ ज्योतिर्लिंग में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग अतिपवित्र माना जाता है, क्युकी यहाँ ब्रह्मा-विष्णु-महेश का एकत्रित स्वरूप विराजमान है। सभी कष्टों से मुक्त करने हेतु गंगा माता का यहाँ उगम हुआ है। इसीलिए त्र्यंबकेश्वर मंदिर में पूजा करने से आपको अनेक लाभ मिलते है।

कालसर्प दोष योग क्या है?

कालसर्प योग व्यक्ति के जन्मकुंडली में पाया जाने वाला दोष है। काल का अर्थ होता है समय और सर्प का अर्थ होता है साँप। सर्प की लंबाई हमें देरी से बितने वाले समय को दर्शाती है। इसी तरह से कालसर्प योग भी जीवन में लंबे समय तक बना रहता है। इस लंबे समय में साँप का विष यानी दुःख हमारे जीवन में फैल जाता है; जिसे कालसर्प योग दोष भी कहा जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कालसर्प योग जन्मकुंडली में राहु और केतु की स्थिति को देखकर पता लगाया जाता है। राहु ग्रह के अधिदेवता काल है एवं केतु के प्रत्यधिदेवता सर्प (साँप) है। व्यक्ति के जन्मकुंडली में जब सारे ग्रह राहु और केतु के मध्य में आ जाते है तब कालसर्प योग का निर्माण होता है। इस योग में राहु ग्रह सर्प के मुख को दर्शाता है तथा केतु सर्प की पूंछ को दिखाता है। साँप जब जमीन पर रेंगता है तो उसका शरीर संकुचित होता है और पुनः फैलता है वैसेही कालसर्प योग में राहु और केतु के बीच बाकी ग्रह होते है। इस योग के कारण व्यक्ति को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।      

कालसर्प योग पूजा नियम:

  • कालसर्प योग दोष पूजा १ दिन की होती है जिसमे २ से ३ घंटे का अवधि लगता है।  
  • आपको पूजा महूर्त से एक दिन पहले ही त्र्यंबकेश्वर आना अनिवार्य है।
  • पूजा का आरंभ होने से पूर्व भक्तों को कुशावर्त तीर्थ में डुबकी लगाकर अपने हाथ और पाँव धोना आवश्यक है।
  • पूजा के लिए नए वस्त्र लाना आवश्यक है जिसमे पुरुष कुरता एवं धोती और महिलाओं के लिए साड़ी होनी चाहिए। काले रंग के वस्त्र ना लाए।
  • पूजा के बाद आपको पूजा के वस्त्र वही छोड़ देना चाहिए, उन्हें साथ न ले जाए।
  • काल सर्प पूजा के दिन आपको प्याज और लहसुन से बने पदार्थ अथवा भोजन नहीं करना चाहिए।
  • व्यक्ति को मांसाहारी भोजन या शराब का सेवन पूजा के दिन से लेकर ४१ दिन तक करना नहीं है।

कालसर्प योग के लक्षण:

१) व्यक्ति शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान रहता है। 

२) व्यापार तथा कारोबारी में हमेशा नुकसान बना रहता है।   

३) कर्ज चुकाने में देरी होने से सामजिक कठिनाइयाँ बढ़ती है।    

४) बच्चों का लालन पोषण करने के लिए उचित धन का अभाव होता है। 

५) अनेक बार किए हुए प्रयत्न भी असफलता में बदल जाते है। 

६) संतान सुख में कमी आती है।  

७) विवाह के लिए देरी या विवाह में विघ्न आने की संभावना होती है।  

८) पति-पत्नी में कलह बने रहते है।  

९) व्यक्ति आपराधिक मामले में फंस जाता है।

१०) काम काज में मन नहीं लगता।

कालसर्प दोष कितने वर्ष तक रहता है? 

कालसर्प दोष व्यक्ति के जीवन में ५५ वर्षों तक रहता है। 

कालसर्प योग के उपाय:

निचे दिए गए उपायों से कालसर्प दोष का प्रभाव कम होता है -

  • घर या मंदिर में जाकर शिवलिंग पर प्रतिदिन जल से अभिषेक । 
  • प्रदोष के दिन शिव मंदिर में रुद्राभिषेक । 
  • नागपंचमी के दिन व्रत।  
  • कुलदेवता की प्रतिदिन आराधना । 
  • प्रतिदिन महामृत्युंजय मंत्र का १०८ बार जाप । 
  • हनुमान चालीसा नित्य ११ बार पठन । 
  • अपने घर पर मोरपंख रखना चाहिए। 

कालसर्प दोष निवारण मंत्र:

“ॐ रां राहवे नम:”

“ॐ कें केतवे नमः” 

कालसर्प दोष निवारण विधि:

त्र्यंबकेश्वर में की जानेवाली कालसर्प योग दोष पूजा में प्रथम पूजा का संकल्प लिया जाता है। संकल्प के बाद श्री गणेशजी का पूजन होता है। जिसके पश्चात पुण्याहवाचन, मातृका पूजन, नांदी श्राद्ध, नवग्रह पूजन, रुद्रकलश पूजन, बलिप्रदान और पूर्णाहुति दी जाती है। कालसर्प दोष पूजा के पश्चात व्यक्ति की सभी परेशानियाँ दूर होकर शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक प्रगति होती है।

कालसर्प दोष पूजा के फायदे:

१) व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में खुशहाली

२) सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि 

३) पारिवारिक शांति का लाभ 

४) व्यापार में विकास 

५) नौकरी के पद में उन्नति

६) मानसिक शांति का लाभ 

७) आर्थिक मामलों से मुक्ति

कालसर्प योग के प्रकार:

१) अनन्त कालसर्प योग:

अनन्त कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु लग्न भाव में तथा केतु सप्तम भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। अनन्त कालसर्प योग के कारण व्यक्ति को जीवन में परेशानियों का सामना पड़ता है। स्वास्थ्य से जुडी शिकायतें, वैवाहिक जीवन में बाधाएं, मानसिक पीड़ा, व्यवसाय में आर्थिक हानि, न्यायालयीन मुकदमों जैसी तनावभरी गतिविधियों से गुजरना पड़ता है।

२) कुलिक कालसर्प योग:

कुलिक कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु दूसरे भाव में तथा केतु अष्टम भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। कुलिक कालसर्प योग के परिणाम से व्यक्ति को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। कर्ज का बोझ ढोना पड़ता है। बहुत कठिन परिश्रम के बाद भी सफलता नहीं मिलती। कुलिक कालसर्प योग के कारण मित्र भी शत्रु बन जाते है। सफर के दौरान दुर्घटना का भय बना रहता है।

३) वासुकी कालसर्प योग:

वासुकी कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु तीसरे भाव में तथा केतु नवम भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। वासुकी कालसर्प योग के प्रभाव से परिवार में भाई-बहन तथा रिश्तेदारों से परेशानी होती रहती है। सभी लोग मिलकर ऐसे व्यक्तियों का खूब फायदा उठाते है। ऐसे व्यक्तियों को पारिवारिक सुख प्राप्त नहीं होता और मानसिक तनाव भी सहना पड़ता है।  

४) शंखपाल कालसर्प योग: 

शंखपाल कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु चतुर्थ भाव में तथा केतु दशम भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। शंखपाल कालसर्प योग के प्रभाव से व्यक्ति के शैक्षणिक जीवन में अनेक उतार चढ़ाव देखने मिलते है। चन्द्रमा की पीड़ा होती है जिस कारण व्यक्ति का मानसिक संतुलन खराब होता है। ऐसे में हाथ में लिया कार्य पूरा नहीं हो पाता और आर्थिक परेशानियों का सामना पड़ता है।

५) पद्म कालसर्प योग: 

पद्म कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु पंचम भाव में तथा केतु एकादश भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। पद्म कालसर्प योग के कारण व्यक्ति को संतानप्राप्ति में विलंब होता है, मनमें अचानक से संन्यास लेने की भावना जागृत हो जाती है। जिस कारण दाम्पत्य जीवन आहत होने की संभावनाए बन जाती है। ऐसे व्यक्ति को मित्रों से आर्थिक नुकसान होता है।  

६) महापद्म कालसर्प योग:

महापद्म कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु छठे भाव में तथा केतु द्वादश भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। महापद्म कालसर्प योग के परिणाम स्वरूप व्यक्ति का जीवन संघर्ष तथा कठिनाइयों से भरा होता है। ऐसे व्यक्ति को जीवनसाथी तथा परिवार से दूर रहना पड़ सकता है। जुए की लत, बुरी आदतें, कर्जा तथा कानूनी मामलों में अदालत के चक्कर लगाने पड़ते है।   

७) तक्षक कालसर्प योग:

तक्षक कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु सप्तम भाव में तथा केतु लग्न भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य मंं सारे ग्रह स्थित हों। तक्षक कालसर्प योग के परिणाम स्वरूप व्यक्ति को पैतृक संपत्ति से विमुख होना पड़ता है। व्यापार में साझेदारी करने से आर्थिक नुकसान होता है, जिस कारण जीवन में निराशा छाने लगती है।  

८) कार्कोटक कालसर्प योग:

कार्कोटक कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु अष्टम भाव में तथा केतु द्वितीय भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। कार्कोटक कालसर्प योग के प्रभाव से व्यक्ति धन की बेफजूल खर्ची होती है। आय से ज्यादा धन का व्यय होने से बचत नहीं होती, जिस कारण मन को भय और चिंता घेर लेती है।  

९) शंखचूढ़ कालसर्प योग:

शंखचूढ़ कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु नवम भाव में तथा केतु तीसरे भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। शंखचूढ़ कालसर्प योग के प्रभाव से व्यक्ति को माता और पिता का सुख नहीं मिल पाता। जीवन में असफलता और निराशा चारो ओर से घेर लेती है। मस्तिष्क से जुडी बीमारियां घेर लेती है।

१०) घातक कालसर्प योग:

घातक कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु दशम भाव में तथा केतु चतुर्थ भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। घातक कालसर्प योग के प्रभाव से व्यक्ति की जीवन यापन में आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। वैचारिक स्थिरता बिगड़ती है। अकाल मृत्यु का भय बना रहता है।  

११) विषधर कालसर्प योग:

विषधर कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु एकादश भाव में तथा केतु पंचम भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। विषधर कालसर्प योग के परिणाम स्वरूप व्यक्ति को आजीवन अकेलापन महसूस हो सकता है। पत्नी तथा परिवार के अन्य व्यक्तियों के साथ विवाद और तनाव बना रहता है।    

१२) शेषनाग कालसर्प योग:

शेषनाग कालसर्प योग जन्मकुंडली में तब दिखाई देता है, जब राहु द्वादश भाव में तथा केतु छ्ठे भाव में उपस्थित हो और इन दोनों ग्रहों के मध्य में सारे ग्रह स्थित हों। शेषनाग कालसर्प योग के प्रभाव से व्यक्ति को पत्नी से तलाक लेने की नौबत आ सकती है। दुर्भाग्य पीछा नहीं छोड़ता। समाज में मान-सन्मान खोना पड़ सकता है।  

कालसर्प दोष पूजा दक्षिणा

पूजा की दक्षिणा यह पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री एवं पण्डितजी की संख्या पर निर्भर होती है। आप पूजा होने के बाद भी दक्षिणा दे सकते है।

कालसर्प दोष की पूजा कहाँ होती है?

कालसर्प दोष की पूजा त्र्यंबकेश्वर में ताम्रपत्रधारी पण्डितजी के निवासस्थान पर होती है। अनेक पीढ़ियों से त्र्यंबकेश्वर मंदिर में पूजा करने का अधिकार पण्डितजी को प्राप्त है। यह अधिकार ताम्रपत्र पर अंकित किया गया है, जो पेशवाकाल से सुरक्षित रखा गया है।  

पुरोहित संघ वेबसाइट से आप ऑनलाइन ऑनलाइन त्रिम्बकेश्वर के पंडित जी बुक कर सकते हो।

बुक त्रिम्बकेश्वर पंडितजी ऑनलाइन

कालसर्प दोष पूजा मुहूर्त २०२१

काल सर्प पूजा के मुहूर्त जानने के लिए आपको त्रिम्बकेश्वर पंडितजी से संपर्क करना होगा। वो आपकी कुंडली देखकर अच्छा मुहूर्त बताएँगे। पुरोहित संघ के ऑनलाइन पूजा बुकिंग पोर्टल के साथ आप ऑनलाइन पूजा के पंडितजी भी बुक कर सकते हो। अधिक जानकारी के लिए पुरोहित संघ के ऑफिसियल वेबसाइट को जरूर भेट दे।

Friday, 30 July 2021

Kaal Sarp Dosh Nivaran Puja Cost, Dates, Muhurat, Remedies, Samagri and Benefits

  Kaal Sarp Dosh Nivaran Puja Cost, Dates, Muhurat, Remedies, Samagri and Benefits

Kaal Sarp Puja Trimbakeshwar

Are you suffering from Kaal Sarp Dosha? Rahu and Ketu's positions are not good, facing issues in business or life, Planning to perform puja at Trimbakeshwar. For all these questions, we have a perfect solution. 

How to remove Kaal Sarp Dosh? As we know, Trimbakeshwar is the origin of River Godavari; performing any puja at this temple is more effective than in any other place. Puja like Kaal Sarp Dosh Puja, Narayan Nagbali Puja, Tripindi Shradh Puja, Rudra Abhishek, Mahamrityunjay Mantra Jaap Puja, and Kumbh Vivah is performed at Trimbakeshwar Temple. 

Kaal Sarp Dosha makes a person's life the most challenging and complex one. It proceeds when all seven planets are situated between Rahu and Ketu. They are not able to attain success and face verbal fights with family and friends.

What is Kaal Sarp Puja?

As per Astrology, Snake signifies the Moon's nodes. Rahu indicates the Head of the snake, and Ketu indicates the snake's tail. If the Kundali of an individual shows all the seven planets are situated between Rahu and Ketu in the reverse order, then Kaal Sarp Yog gets created.

If any individual has Kaal Sarp Yog in his Birthchart or Kundali, has suffered from different types of problems in life. Problems like dissatisfaction, unhappiness, business failure, education, job and arguments with relatives or family, etc.

If an individual has Kal Sarp Yog in his Kundali, he/she often dreams about snakes, and they repeatedly see their dead relatives in their dream. They may also dream about their own house or water bodies. An individual having Kaal Sarp Yog in Birthchart or Kundali may face issues to have a baby.

Best Pandit for Kaal Sarp Puja in Trimbakeshwar

Trimbakeshwar is the holiest place in Nashik, Maharashtra, because Trimbakeshwar Temple is one of the Swayambhu Jyotirlinga among the 12 Jyotirlingas In India. It is located here in its three faces embodying Lord Brahma, Lord Vishnu, and Lord Rudra. 

A group of Panditji who perform all types of Hindu rituals is called Purohit Sangh Guruji/ Panditji. These Guruji are Tamrapatrdhari. Tamrapatrdhari means one who has a birthright to achieve Kaal Sarp or any type of Puja in Trimbakeshwar. They do all kinds of Puja like Narayan Nagbali, Kaal Sarp Shanti, Tripindi Shardh Puja, Kumbh Vivah, Rudra Abhishek, and Mahamrityunjay Jaap. All these Panditji having 25 years of experience and did more than 10000+ Kaal Sarp Puja to date and gives 100% satisfaction to the devotees. I think Purohit Sangh Guruji in Trimbakeshwar is the best Pandit for Kaal Sarp Puja.

If you are planning to perform puja at Trimbakeshwar temple, no need to worry, Purohit Sangh Guruji will guide you to perform Kaal Sarp Dosh Puja, and they provide puja samgri too. 

Important Note: Dear Yajmana (Guest) Please take a note that these Trimbakehswar Poojas should be done at the Trimbakeshwar Temple only by Tamprapatra holder Panditji they are authentic and holding the authority from ages to perform pujas in Trimbakehswar and pujas get done by this Panditji will result in satisfaction and a complete solution to your problem. We want you to reach out to the most authentic source.

For Online Pooja Booking Visit: Kalsarpa Pooja in Trimbakeshwar

Kaal Sarp Puja Benefits

After performing this puja, Species of snakes get satisfied and change their position. There are so many benefits of Kaal Sarp Puja. Some of them are list here. 

  • The primary and essential benefit of dosh is that all seven planets or species of Snakes will satisfy a person if he or she does the Kaal Sarp Dosh Puja.
  • It gives personal and professional stability.
  • The devotee also gets the satisfaction of Goddess Lakshmi by worshipping the Gold Idol of the Snake. 
  • It leads to a successful professional life.
  • It provides harmony and peace of mind.
  • Puja resolves problems related, career or education. 
  • Delay in marriage problems also gets solved because of Kaal Sarp Puja. 

When should a person do this Pooja?

The most effective day to perform this pooja is Amavasya. Also, at the time of the Lunar and Solar Eclipse, we can perform Kaal Sarp puja. A devotee should do Kaal Sarp Yog on Naga Panchami, Sunday and Tuesday, for good results, do the pooja twice a year. This pooja also takes place at the time of the Uttarayanam and Dakshinayanam periods.

kaal sarp puja procedure

  • It's a one-day Puja and takes 2 hours to finish this Vidhi or Pooja. 
  • Take holy dip in Kushavarta Kund. Relatives who are participating in the pooja should take a bath before this Pooja.
  • Need new clothes for puja. Dhoti for Men and Saree for Women's. A pregnant woman should not perform this pooja.
  • We worship Ganapati, one Gold Nag, Matrika Pujan, one Siver Murti of Rahu, One silver Murti of Kaal. 
  • After Navagraha puja, worship Shivji on the Kalash and do Havan with pure Ghee and Kala.
  • After the completion of this Pooja, do the Rudrabhishekam that makes the Pooja process finished.

Kaal Sarp Dosh Puja Cost

Trimbakeshwar Temple is the perfect place to perform Kaal Sarp Dosh Pooja. Trimbakeshwar has situated 28km from Nashik in Maharashtra. It is one of the Swayambhu jyotirlingas, and it is also part of the grand Pancha Jyotirlinga Tour in Maharashtra. 

Kaal Sarp Puja Cost totally depends on the PanditiJi/ Guruji. It also depends on the puja Samgri used by Guruji. 

If you want to know about Kalsarp yog in Hindi visit: Kalsarpa Pooja in Hindi

Saturday, 3 July 2021

कालसर्प शांती म्हणजे काय?


जब बाकि सब ग्रह राहु और केतु ग्रहों के बीच में आते है, तभी कालसर्प योग दोष निर्माण होता है। कालसर्प योग एक ऐसा दोष है जो ग्रहों की अव्यवस्थाओं द्वारा निर्माण होता है। इस दोष को दूर करने के लिए, त्रिम्बकेश्वर शिव मंदिर परिसर   (नासिक, महाराष्ट्र) में कालसर्प योग शांति पूजा करनी चाहिए।

यदि किसी भी व्यक्ति के जन्म कुंडली में कालसर्प योग है, तो विभिन्न प्रकार की समस्या उसके जीवन में आती है, जैसे व्यापार में विफलता, शिक्षा, नौकरी, शादी समस्या , असंतोष, नाखुशी, निराशा, रिश्तेदारों से झगड़ा या परिवार के साथ बहस आदि जैसे बहुत समस्याओ का सामना उस व्यक्ति को करना पड़ता है।

आपको इस दोष का निवारण नासिक के त्र्यंबकेश्वर यहाँ मिलेगा, कालसर्प दोष निवारण के लिए आपको "कालसर्प योग शांति पूजा" करना अनिवार्य है। । किसी भी कुंडली में कुल १२ स्थान और नौ ग्रह होते हैं। यदि सात ग्रह जैसे ग्रह सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि, राहु और केतु के बाईं या दायी ओर स्थित हैं तभी कुंडली कालसर्प के योग में स्थित जानि जाती है।

काल सर्प योग के प्रकार


कालसर्प योग के अन्य विभिन्न प्रकारो का उल्लेख नीचे दिया गया है:

  • अनंत कालसर्प योग : अनंत कालसर्प योग तभी बनता है जब कुंडली में राहु और केतु क्रमशः प्रथम और सातवें स्थान पर होते है।
    (इस दोष का प्रभाव - जीवन में संघर्ष)
  • कुलिक कालसर्प योग : कुलिक कालसर्प योग तभी बनता है जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान क्रमशः दूसरा और आठवां होता है।
    (इस दोष का प्रभाव - खर्चा , परिवार के साथ बहस )
  • वासुकी कालसर्प योग : वासुकी कालसर्प योग तभी बनता है जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान तीसरा और नौवां होता है।
    (इस दोष का प्रभाव - परिवार के सदस्यों में विवाद).
  • शंखपाल कालसर्प योग : शंखपाल कालसर्प योग तभी बनता है जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान चौथा और दसवां होता है।
    (इस दोष का प्रभाव - संतान प्राप्ति से संबंधित समस्या )
  • पद्म कालसर्प योग : पद्म कालसर्प योग तभी बनता है जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान क्रमशः पांचवां और ग्यारहवां होता है।
    (इस दोष के प्रभाव - वित्तीय, शिक्षा की समस्याएं)
  • महापद्म कालसर्प योग : जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान छठा और बारहवां रहता है, तो यह महापद्म कालसर्प योग बनता है।
    (इस दोष का प्रभाव- शत्रुओं से तनाव)
  • तक्षक कालसर्प योग : जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान क्रमशः सातवां और प्रथम होता है, तभी यह तक्षक कालसर्प योग बनता है।
    (इस दोष का कारण प्रभाव - व्यक्ति के विवाहित जीवन में समस्या )
  • कर्कोटक कालसर्प योग: जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान क्रमशः आठवां और दूसरा होता है, तब यह कर्कोटक कालसर्प योग बनता है।
    (इस दोष का प्रभाव - व्यावसायिक समस्याएं)
  • शंखचूड कालसर्प योग शंखचूड कालसर्प योग तब बनता है जब कुंडली में राहु और केतु का स्थान क्रमशः नौवें और तीसरे स्थान पर होता है।
    (इस दोष का प्रभाव - आकस्मिक समस्याएं)
  • घटक कालसर्प योग जब किसी के कुंडली में राहु और केतु का स्थान क्रमशः दसवां और चौथा होता है, तो यह घाट कालसर्प योग कहा जाता है।
    (व्यापार में इस दोष के कारण प्रभाव होता है )
  • विशधर कालसर्प योग जब कुंडली में राहु और केतु क्रमशः ग्यारहवें और पांचवें स्थान पे होते है, तब यह विशद कालसर्प योग बनता है।
    (इस दोष के प्रभाव - जीवन में संघर्ष, पारिवारिक सदस्यों में विवाद)
  • शेषनाग कालसर्प योग जब कुंडली में राहु और केतु क्रमशः बारहवां और छठे स्थान पर होते है, तो यह शेषनाग कालसर्प योग बनता है।
    (इस दोष का प्रभाव - स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं)
यह काल सर्प योग शांति पूजा सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए और सभी कठिनाइयों को दूर करने के लिए सिर्फ नासिक त्र्यंबकेश्वर मंदिर में की जाती है। यह पूजा विधि अनुष्ठान और भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद शारीरिक पाप, बोले गए पाप, और अन्य पाप दूर हो जाते है।

कालसर्प योग शांति पूजा करने के विभिन्न कारण

बहुत से लोग जानते हैं कि उनकी कुंडली में कालसर्प दोष है, लेकिन ये जानने के बाद भी इसकी उपेक्षा करते हैं, तभी जीवन में वास्तविक कठिनाइयां शुरू हो जाती हैं।

सफल होने के लिए, समाज में अपना नाम और पहचान बनाने के लिए, व्यक्ति की कुंडली में इस दोष को खत्म होना आवश्यक है जो की कालसर्प योग शांति पूजा करने से होता है।

कालसर्प योग शांति पूजा सभी मनोकामनाओं और इच्छा को पूरा करने के लिए की जाती है। समय के अनुसार दोष का हानिकारक प्रभाव बढ़ता है तो जैसे ही किसी को उनकी कुंडली में इस दोष के बारे में पता चले तो इस "कालसर्प योग शांति पूजा" को नासिक में स्थित त्र्यंबकेश्वर में सपन्न करना चाहिए।

कालसर्प योग शांति पूजा प्रक्रिया

कालसर्प योग शांति पूजा में प्रथम प्रतिज्ञा करते है जिससे हम भगवान से शुभ फल प्राप्त करने और सभी दोषों को बाहर निकालने की प्रार्थना करते हैं। अच्छी सेहत पाने के लिए व्यक्ति को सूर्य की

उपासना करनी अनिवार्य है। मन की शांति पाने के लिए, सभी को दीप, चंद्रमा, और वर्षा के देवता (भगवान वरुण) की उपासना करनी अनिवार्य है। जिसमें सभी पुण्य नदियों, समुद्रों और पवित्र तीर्थ स्थान होते हैं, जिन्हें मनुष्य के सांस, जीवन के रूप में माना जाता है।

प्रथम व्रत के बाद, सबसे पहले भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है क्योकि धर्मशास्त्र के अनुसार किसी भी अवसर या अनुष्ठान को शुरू करने से पहले भगवान श्री गणेश जी की पूजा करना अनिवार्य है। भगवान श्री गणेश बुद्धि के देवता जो हमें एक अनोखी बुद्धि प्रदान करते है और साथ ही वे हमारे जीवन में सभी प्रकार की कठिनाइयों को दूर करते हैं।

कालसर्प योग शांति पूजा करने से, समृद्धि, धर्म कल्याण, वृद्धि, और धन की प्राप्ति हमारे पूरे परिवार के लिए भगवान और ब्राह्मणों के आशीर्वाद से प्राप्त किया जा सकते हैं।

कालसर्प योग शांति पूजा

nagbali puja

जीवन में कालसर्प दोष के हानिकारक प्रभाव को कम करने के लिए, यह कालसर्प शांति पूजा सम्पन्न की जाती है। कोई भी व्यक्ति जो इस दोष से पीड़ित है इस पूजा को स्वयं कर सकता है, यदि प्रभावित व्यक्ति बहुत छोटा है तो माता-पिता इस पूजा को कर सकते हैं।

जैसे ही कोई अपनी जन्म कुंडली में इस दोष के बारे में पता चलता है तब यह कालसर्प शांति पूजा को त्र्यंबकेश्वर मंदिर में करना चाहिए। इससे वह व्यक्ति सभी प्रकार के कठिनाइयों से मुक्त होता है।

अन्य बारह कालसर्प योग पूजा प्रकारों के साथ राहु-काल सर्प योग पूजा त्र्यंबकेश्वर मंदिर में कि जाती है।

ऊपर दिए गए अन्य बारह कालसर्प योग पूजा प्रकारों (अनंत काल सर्प योग, कुलिक कालसर्प योग, वासुकी काल सर्प योग, शंखपाल काल सर्प योग, पद्म काल सर्प योग, महा पद्म काल सर्प योग, तक्षक काल सर्प योग, शंखचूड़ काल सर्प योग, कर्कोटक काल सर्प योग, घातक काल सर्प योग, विषधर काल योग, शेषनाग काल सर्प योग) के साथ राहु-काल सर्प योग पूजा त्र्यंबकेश्वर मंदिर में कि जाती है।

दोनों ग्रह (राहु और केतु) अन्य ग्रहो की तरह दिखाई नहीं देते, लेकिन जब सभी नौ ग्रह (ग्रह सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि, राहु और केतु ) राहु और केतु ग्रहों के बीच आते हैं तो यह दोष का निर्माण होता है। राहु ग्रह पिछले जन्म के कर्मों को दर्शाता है। काल राहु ग्रह के "अभिदेवता" और सर्प (साँप) उसके "प्रतिदेवता" (उप-देवता) माने जाते है। यह अनुष्ठान करने से किसी भी व्यक्ति को ग्रहों से आशीर्वाद प्राप्त होकर सभी दोष दूर हो जाते है।

सर्वोच्च देवता भगवान शिव की साधना

भगवान शिव (त्र्यंबकेश्वर) प्रमुख और सर्वोच्च देवता हैं वे क्रोध के देवता के रूप में जाने जाते हैं जो बुराई का सर्वनाश करते हैं। धर्मशास्त्र के अनुसार, भगवान त्र्यंबकेश्वर की पूजा करना हर प्रकार की कालसर्प शांति पूजा और यज्ञ में अनिवार्य है, जिससे प्रमुख देवता का आशीर्वाद प्राप्त हो कर और सभी प्रकार के संकट दूर हो जाते है।

उत्तर पूजा

बलिदान पुर्णाहुति या उत्तर पूजा यह "कालसर्प शांति पूजा" का अंतिम अनुष्ठान है। किसी भी व्यक्ति के सभी पवित्र कर्म और किये गए अनुष्ठान भगवान श्री त्र्यंबकेश्वर को समर्पित हैं, जिससे अनुष्ठान करने वाले को सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

nagbali puja

कालसर्प योग दोष के दुष्परिणाम

किसी भी व्यक्ति अगर इस दोष से पीड़ित है, तो उसे कालसर्प योग शांति पूजा करना अनिवार्य है। यदि सम्बंधित व्यक्ति ने कालसर्प योग शांति पूजा अनुष्ठान नहीं किया तो उसे निचे दिए गए दुष्परिणामों का सामना करना पड सकता है:

  • सफलता के लिए संघर्ष।
  • समाज में अनादर।
  • विवाह संबंधित मुश्किलें।
  • सबंधित कार्य क्षेत्र मे स्थिर विकास।

कालसर्प योग शांति पूजा कालावधी

कालसर्प योग शांति पूजा के लिए संबंधित व्यक्ति को पूजा से पहले शुद्धिकरण विधि के लिए पवित्र कुशावर्त कुण्ड में पवित्र स्नान करना और व्रत का पालन करना अनिवार्य है। पुरोहितों द्वारा यह सुझाव दिया जाता है की कालसर्प योग शांति पूजा अनुष्ठान पूरा करने के लिए कुलविधि २ से ३ घंटे आवश्यक है, लेकिन संबंधित व्यक्ति पूजा के १ दिन पहले ही त्र्यंबकेश्वर उपस्थित रहे।

कालसर्प योग शांति अनुष्ठान करते समय कौणसे वस्त्र प्रधान करने चाहिए?

पुरोहितो द्वारा यह सुझाव दिया जाता है कि, कालसर्प योग शांति पूजा करते समय पुरुषों को धोती कुर्ता और महिलाओं को साड़ी (काले, हरे जैसे रंग के अलावा) पहननी चाहिए। कहा जाता है कि इस अनुष्ठान के लिए काले और हरे रंगों के वस्त्र वर्ज है।

Tuesday, 29 June 2021

त्रिपिंडी श्राद्ध त्र्यंबकेश्वर

 त्रिपिंडी श्राद्ध ये संकल्पना अपने पूर्वजो की आत्माओ को शांति मिलने के लिए उनके वंशजों द्वारा कि जाने वाला एक अनुष्ठान है। त्रिपिंडी श्राद्ध ये एक काम्य श्राद्ध है, जो अपने मृत पूर्वजो के याद में अर्पित किया जाता है। अगर तीन वर्षों तक, वंशजों द्वारा पूर्वजो के आत्माओ के शांति मिलने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध नहीं किया गया, तो मृत हिंसक हो जाते है, इसलिए उन्हें शांत करने के लिए पिंड दान विधि की जाती है।

त्रिपिंडी श्राद्ध

श्राद्ध कमलाकर शास्त्र के अनुसार, हमारे पूर्वजों के श्राद्ध एक वर्ष में ७२ बार किया जाना चाहिए अगर कई वर्षों से किसी कारण से श्राद्ध नहीं किया गया, तो पूर्वज असंतुष्ट और नाराज रहते हैं।

आदित्यपुराण धर्मशास्त्र के अनुसार, यह कहा जाता है कि यदि त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान हर साल नहीं किया गया, तो पूर्वज असंतुष्ट हो कर वंशजों को उसके दुष्परीणामो का सामना करना पड़ता है।


अमावस्या व्दादशैव क्षयाहव्दितये तथा।षोडशापरपक्षस्य अष्टकान्वष्टाकाश्च षट॥
संक्रान्त्यो व्दादश तथा अयने व्दे च कीर्तिते।चतुर्दश च मन्वादेर्युगादेश्च चतुष्टयम॥


न सन्ति पितरश्र्चेति कृत्वा मनसि यो नरः।
श्राध्दं न कुरुते तत्र तस्य रक्तं पिबन्ति ते॥(आदित्यपुराण)


ऊपर दिए गए मंत्र के श्लोक से, यह देखा गया है कि हर किसी को अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि वंशज श्राद्ध अनुष्ठान नहीं करते हैं, तो उन्हें दोष के कारण कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

त्रिपिंडी श्राद्ध विधी करने के कारण

nagbali puja
  • त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान भूतों, शकिनी, डाकिनी, आदि की यातनाओं से मुक्ति पाने के लिए किया जाता है।
  • त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान गृह क्लेश, व्यापार में असफलता, शांति की कमी, स्वास्थ्य, वित्तीय समस्या, असामयिक मृत्यु, इच्छाओं की असंतोषता, व्यावसायिक समृद्धि की कमी, शादी की समस्या, और संतान आदि विभिन्न समस्याओं दूर करने के लिए किया जाता है।
  • विभिन्न पापों और पूर्वजों द्वारा शापों से राहत पाने के लिए, यह त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है।

भगवान ब्रम्हा पुण्य के प्रतिनिधि हैं, भगवान विष्णु और भगवान महेश (शिव) क्रोध के प्रतिनिधि हैं जिनकी आराधना इस अनुष्ठान में की जाती है। इस त्रिपिंडी श्राद्ध में भगवान ब्रम्हा की पूजा करके उन्हें जेवी पिंड (जौ की गांठ) की दिखाइ जाती है ताकि वे शवों को क्षत-विक्षत कर सकें। दुःख से राहत पाने के लिए, भगवान विष्णु की पूजा की जाती है, जबकि क्रोध के कष्टों से राहत के लिए, भगवान रुद्र की आराधना की जाती है।

जो लोग बचपन या युवावस्था में गुजर गए, उनकी आत्माए असंतुष्ट और अप्रसन्न रहती है, उसके लिये उनके घर वालो को नासिक,त्रिम्बकेश्वर शिव मंदिर परिसर  में उनके लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करना चाहिए। त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान में पुर्वजो के नाम और "गोत्र" का उच्चारण नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि किसी को भी सखोल ज्ञान नहीं होता है कि कौनसे पूर्वजों के शाप से वे पीडित है और कौनसे पूर्वज नाराज हैं । हमारे पूर्वजों की असंतुष्ट आत्माओं को मुक्ति पाने के लिए, यह त्रिपिंडी श्राद्ध विधी मुख्य रूप से नासिक में स्थित त्र्यंबकेश्वर में कि जाती है।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर परिसर  में त्रिपिंडी श्राद्ध विधी

त्रिपिंडी श्राद्ध एक धार्मिक विधी है जो की केवल नासिक में स्थित त्र्यंबकेश्वर मंदिर मे ही की जाती है, जो मुख्यतः दानव मुक्ति के लिए है।

त्रिदेवता (भगवान श्री ब्रह्मा , भगवान श्री विष्णु , भगवान श्री शिवा ) जो इस अनुष्ठान में प्रमुख देवता है, जिनके आशिर्वाद से पूर्वजो की असंतुष्ट आत्माओ को मोक्ष मिलता है।

यह उचित है कि नवरात्र उत्सव के दिनों में इस श्राद्ध विधी को और इसके अलावा एक ही दिन त्रिपिंडी और तीर्थ श्राद्ध न करें। लेकिन अगर किसी कारणवश करना पड़े तो पहले त्रिपिंडी श्राद्ध करें और फिर तीर्थ श्राद्ध करें। त्रिपिंडी श्राद्ध करने से पहले, माफी मांगने और शरीर शुद्धिकरण के लिए गंगा नदी में एक पवित्र स्नान करना आवश्यक है।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा "विष्णु पाद" पर संकलित "पिंड" (चावल के बनाये पिंड ) के साथ की जाती है, जिससे गदाधर के रूप में स्थित भगवान विष्णु शांत होते हैं। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, यह सुझाव दिया जाता है, कि यह त्रिपिंडी श्राद्ध केवल तीर्थक्षेत्र में किया जाता है, और अन्य तीर्थक्षेत्र जैसे रामेश्वरम, गोकर्ण, श्रीरंगपट्टण, श्रीशैलम, गया मे से त्र्यंबकेश्वर सबसे शुभ स्थान माना जाता है।

यह आवश्यक है कि यह अनुष्ठान को पुरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ विशेषज्ञों पुरोहितो के मार्गदर्शन में किया जाए। इसलिए, त्रिपिंडी श्राद्ध संस्कार पितृ दोष निवारण विधी की अधिक जानकारी के लिए आपको "त्र्यंबकेश्वर गुरुजी" के ऊपर दिए गए खंड (सेक्शन) से गुजरना होगा, जहाँ आपको विभिन्न विशेषज्ञों पुरोहितों के नाम और उनके संपर्क के लिए विजिटिंग कार्ड मिलेंगे।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा कब करनी चाहिए?

हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह अनुष्ठान वैशाखमास, श्रवणमास, कार्तिकमास, मार्गशीर्षमा, पौषमास, माघमास और फालुगुणमास जैसे महीनों में की जानी चाहिए।

त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान के लिए दक्षिणायन और पंचमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी जैसी तिथि या अमावस्या भी अधिक उचित है। इस त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा को कन्या राशी या तुलसी (राशि तुला) में सूर्य के पारगमन के दौरान करना होगा, जो कि आमतौर पर सितंबर और दिसंबर में होता है।

Tuesday, 15 June 2021

Narayan Nagbali, Narayan Bali Puja, Narayan Bali Puja Cost


According to the Garuda Purana, Narayan Nagbali Puja are two different rituals performed for two various reasons. Narayan Bali Puja is performed mainly to set free the ancestors' unsatisfied souls, while Nagbali Puja is performed to eliminate the sin of killing cobra or snake. Both the rituals of Narayan Nagbali and Narayan Bali are performed only at Trimkeshwar near Nashik, Maharashtra.

As Trimbakeshwar, Shivlinga represents three faces signifies Lord Brahma, Vishnu, and Mahesh, which makes this place more special in rituals.

There are two types of Narayan Nagbali Pooja (rituals): Narayan Bali Pooja and Nagbali Pooja. Both the Pooja is performed for two different reasons.

Narayan Bali Puja and Nagbali Puja are described in detail as below:

NARAYAN BALI PUJA

In case any person suffers from depraved death, then the spirit of that person enters into a ghost life till the determined life of an individual gets ends, and after that, it goes towards the hereafter. The name of ritual performed for the Moksha of displease soul and to progress birth-death cycle and get salvation to our dead, unsatisfied ancestors soul is "NARAYAN BALI."

Narayan is known as the Representative name of displeased souls. When performing Narayan Bali, "name" and "Gotras" of the ancestors cannot be uttered by Ritual performer. after that, the displeased soul gets the freedom to obtain salvation from the ghost as Patrilineal life.

After salvation to displeased soul, a person will get familiar pleasure, financial earning, get descendants for family events like marriage and other types of pleasures, health, education, peace of mind and long life. So, the Narayan Bali puja ritual is an effective way to get freedom from all kinds of problems and live a joyful and healthy life.

NAGBALI PUJA

nagbali puja

NAGBALI is a ritual performed to exonerate from snake blame. Snake Blame is identified by various problems such as getting progeny and suffering from health issues like phlegm, bile, wind, three bodily senses of humor, fever, itching, and abdominal disease.

As stated earlier, there is a total of eighty-four lacks of life and four significant manhood in human being life. Cobra life is one of birth out of eighty-four lacks birth. Snake life and human life are closely related to each other, and a similar relationship can be observed broadly in Mahabharata. Lord Bramhdeva created seven ascetics, Kashyap, the son of marichi, had two wives, one named kadru, who gave birth to a snake while the other was called Vinita and gave birth to the eagle. So, from this observed that human being and snake origin are similar scriptural.


एतैत सर्पाः शिकंठ्भूषा लोकोपकाराय भुवं वहन्तः
भूतै समेता मणिभूषितांगाः गृण्हित पूजां परमां नमो वः।
कल्याणरुपं फणिराजमग्य्रं नानाफणा मंडलराजमानम
भक्त्यैकगम्यं जनताशरण्यं यजाम्यहं नः स्वकुला भिवृध्यै॥


According to yoga, body objectives are archived by awakening "Kundalini" (exists in the human body). In a religious scripture by the great sage "Shri. Dnyaneshwar Maharaj," a similar subject in detail is considered. "Kundalini" exists in the wheel, named Muladhara, at the starting point of the human body's spine. By originating Kundalini, man can get theological knowledge. It means it is a theory that life and soul get united, and human being achieves humanness by the similar "Kundalini" knowledge for the same Kundalini is favorable for human scientific fulfillment. In theology, Kundalini is expressed as a "snake," so the state of Kundalini and snake are not that different.

If anyone knowingly or unknowingly caused a snake or cobra's death in his previous life or past life, then snake blame is created. If anyone knowingly or unknowingly caused a snake or cobra's death in his earlier life or past life, then snake blame is made.

Narayan Nagbali Pooja Vidhi (Procedure)

Nagbali Puja

It takes three days to performed Narayan Nagbali Poja.

On the first day, take a holy dip in the kushavarta Kund and wear new clothes. Dhoti for men and saree for women. After a holy bath, we are ready to perform Narayan Nagbali.

Firstly Pradhan Sankalpa is taken. After Sakalpa, We have to make two idols of God Shrivishnu and God Vaivasvat Yama in two pots. There worship to be done in sixteen different steps. With Honey, ghee, and sesame seeds, offer ten pindas for the darbhas. We must have sandalwood paste for this Pooja. Absorb all these pindas in the river or any water bodies.

Day second also starts with taking a holy dip in the kushavarta Kund and wear the new clothes. Devotee visit the Shamshan to perform Sapindh Shaardha. Next is the worship of the Idol of Snake placed on the wheat flour, which has all eight doshas.

On the third day, Lord Ganesha's Worship is performed named "Swastipunyahwachan" to dedicate inauspiciousness. This Ganesh pujan indicates that all negative energies or doshas are burnt in the previous puja, which we performed on the first and second day. Lastly, we worshipped a small golden deity of the snake. The golden idol of cobra is worshipped and donate to priests. Ultimately Coronation worship is offered to Lord Trimbakeshwar at Trimbakeshwar Temple, and the priest blesses the ritual performer and his whole family to be happy. This is how Narayan Nagbali puja vidhi gets completed with the blessings of the Lord Trimbakeshwar.

Important: The duration of Pooja is 2-3 hours; however, the person should reach Trimbakeshwar one day before that of Pooja.

Narayan Nagbali Pooja Benefits

As per Hinduism, For performing PITRUSEVA having more importance than the other seva. Anyone can get their ancestors' blessings if an individual has done this NARAYAN BALI PUJA to liberate their ancestral soul.

Narayan Nagbali pooja benefits are described as below:

  • To seek good health.
  • To get rid of ancestral curses.
  • To eliminate the harmful effects of the Pitru dosha In an individual's life.
  • This Narayan nag Bali puja ritual helps in completing an individual's wishes in business as well as career.
  • Narayan Nagbali puja is especially suggested for those couples facing complications in having offspring.
  • To get rid of the bad dreams of the snake.
  • Elimination of issues which are created by the dead ancestor's soul who attained untimely death.
  • Those who do these Nagbali rituals get free from the sin of killing snakes or cobra.

Narayan Nagbali Puja Cost at Trimbakeshwar

The cost of the Pooja will depend on the puja Samagri used by Guruji. Once the puja vidhi is completed, it purely depends on the devotee what Dakshina he gives or depends upon the conditions.

For more details, you can directly click on Panditji in Trimbakehswar who is authorized to perform the pujas and guide you as per Vedic culture. 

नारोशंकर मंदिर नाशिक | Naroshankar temple nashik

नाशिक येथील  श्री नारोशंकर मंदिर गोदावरी नदीच्या काठावरील पंचवटी परिसरातील नारोशंकर मंदिर हे पेशवाई काळातील वास्तुकलेचे उत्तम उदाहरण आहे – त...